बांधेज की सुबह, और हर डॉट का सब्र
सुबह जयपुर के बांधनी वाले कोने में पहले सिलवटें खुलती हैं, फिर रंग। कार्यशाला की लंबी मेज पर कारीगर छोटी-छोटी रेशों को बाँधकर डॉट बनाते हैं, तभी दुपट्टा या साफा अपनी पहचान लेता है। जौहरी बाजार और बापू बाजार के किनारे ठेलों तक पहुँचते-पहुँचते यह कपड़ा हल्की धूप में और चमक उठता है। यहीं का सच है: बांधेज मशीन से नहीं, हाथ से जीता जाता है। एक ओढ़नी पर हज़ारों बिंदु हो सकते हैं, पर हर बिंदु के पीछे सब्र छुपा होता है। म्हारे जयपुर में इसी को सच्चा काम बोलते हैं—जो पास से देखो, तो और कमाल लगे।
