बापू बाज़ार: कपड़े और जूती का पहला ठिकाना
बापू बाज़ार का पहला असर आँखों से नहीं, उँगलियों से होता है। कपड़े के ठेले, दुपट्टे, लहरिया और बंधेज के साथ जूतियों की कतार—ये सब मिलकर गली को जिंदा रखते हैं। सुबह से ही परिवार की दुकानों के दरवाज़े खुल जाते हैं, और जयपुर आने वाला पर्यटक अक्सर यहीं पहला ठिकाना बनाता है। यहाँ बात सिर्फ खरीदारी की नहीं, मोल-भाव की भी है। दुकानदार 220 बोलता है, खरीदने वाला 160 पर अटकता है, और बीच में हँसी भी आती है। घणी बार यही छोटा सा झगड़ा यारी में बदल जाता है। बापू बाज़ार की खूबी यह है कि यहाँ कपड़े और जूती अलग चीज़ नहीं, एक ही जयपुर वाली पहचान बन जाते हैं।
