बिल आया, पर हिसाब नहीं: जयपुर का सवाल
जयपुर के कई मोहल्लों में लोग एक ही बात पर अटके हुए हैं: बिल तो आ रहा है, पर महीने का साफ हिसाब नहीं दिख रहा। कोई प्रारंभिक शुल्क अलग, कोई अतिरिक्त शुल्क अलग, और बीच में कुल देखकर आदमी बस सिर खुजाता रह जाए। घर की महफ़िल में अब यही चर्चा है कि जब हर चीज़ का दाम लिख सकते हो, तो ब्योरा क्यों नहीं? असल दिक्कत सिर्फ पैसे की नहीं, भरोसे की भी है। लोगों को लगता है कि जब ब्योरा छुप जाए, तो समझ का रास्ता भी बंद हो जाता है। एक पड़ोसी ने सीधी सी बात कही — बिल का कागज़ तो है, पर समझ वाला बिल कहाँ? इसी लिए अब नज़र सिर्फ राशि पर नहीं, उस हिसाब पर है जो हर महीने साफ और सीधा मिलना चाहिए। सच्ची बात है, घर का बजट अँधेरे में नहीं चलता।
