चोखी ढाणी की रात, बाजरे की रोटी का स्वाद
चोखी ढाणी की रात गाँव के मेले जैसी लगती है, बस जयपुर के पास। द्वार के अंदर जाते ही लालटेन की हल्की रोशनी, मिट्टी की महक और ढोल की थाप सुनाई देती है। थाली में बाजरे की रोटी, केर-सांगरी, गट्टे की सब्ज़ी और छाछ आती है — सच्ची, घणी संतोषजनक। फिर लोक संगीत शुरू होता है, घूमर की धुन पकड़ लेती है, और खाट पर बैठकर लगता है समय धीमा हो गया। ऊँट की सवारी पर बच्चे खिलखिला उठते हैं, और बड़े लोग भी एक पल को फिर से सैलानी जैसे हो जाते हैं। म्हारे हिसाब से यही इस जगह का आकर्षण है: खाना, कला और गाँव-रात का एक साथ मिलना।
