दिवाली की रोशनी, पर इस बार दिल से
चेन्नई की गलियों में दिवाली का रंग इस बार थोड़ा और अपना-सा लग रहा है। कुछ निवासियों ने मिलकर ऐसे बच्चों और मानसिक रूप से अस्वस्थ महिलाओं के लिए मिठाइयाँ और कपड़े तैयार किए, जो अक्सर त्योहार की खुशी के केंद्र में नहीं होते। घर के बने लड्डू, हल्के रंग के कपड़े और छोटी-छोटी तैयारियाँ—सब मिलकर एक सीधा संदेश दे रहे थे: त्योहार का मतलब सिर्फ सजावट नहीं, साथ भी है। इस कोशिश की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि यह कोई दिखावा वाली मदद नहीं थी। लोग अपने हाथ से काम करके, बच्चों और महिलाओं की ज़रूरत के हिसाब से चीज़ें लेकर गए। एक निवासी का सीधा-सा अंदाज़ था—जब घर में दिवाली का आनंद हो, तो किसी और के लिए भी रोशनी का इंतज़ाम होना चाहिए। यह सुनकर लगता है, असली त्योहार वही है जहाँ खुशी बाँटी जाए, बचाई नहीं। और बस, इसी में दिवाली की सबसे बड़ी चमक छुपी है।
