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विदेश नीति पर भारत की लाइन और तेज हुई

Foreign policy par India ki line aur tez hui

विदेश नीति पर आज जो बात उठी, वह सिर्फ एक बयान नहीं थी, बल्कि एक आँकड़ों वाली राजनीतिक संकेत-भाषा थी। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने लोकसभा में विपक्षी नेता की बात का समर्थन करते हुए कहा कि कूटनीतिक मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनका कहना सीधा था: भारत को किसी भी देश का अधीनस्थ अनुयायी नहीं बनना चाहिए, चाहे उस देश की शक्ति कितनी भी हो या भारत की आवश्यकता कितनी भी बड़ी हो। ऐसी बात आम तौर पर तब सामने आती है जब दुनिया के बदलते रिश्ते, व्यापारिक दबाव या सामरिक संतुलन पर दल अपना रुख और साफ करना चाहता है। यानी संदेश यह कि विदेश नीति सिर्फ फ़ाइल वाला मामला नहीं, बल्कि देश की छवि और मोलभाव की ताकत का सवाल है। सही कि गलत? यह बहस आगे भी चलेगी, पर आज का सुर सीधा और सख्त था।