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घूमर का घेरा कभी छोटा नहीं होता

Ghoomar ka ghera kabhi chhota nahi hota

घूमर देखने में प्रदर्शन लगता है, पर जयपुर और मारवाड़ में वह ज़्यादा साझा लय है। एक औरत घूमती है, दूसरी उसके कदम पकड़ लेती है, फिर घूँघट, लहँगा और थाप मिलकर घेरा बना देते हैं। घेरा इसलिए छोटा नहीं रहता, क्योंकि उसमें हर नई पाँवड़ी को थोड़ी जगह छोड़नी पड़ती है। मारवाड़ी में बोलें तो, ‘जगह देना’ भी एक कला है। शादी हो, तीज हो या किसी घर का खुशियों वाला दिन, घूमर में सबका साथ दिखता है। जितनी देर घेरा चलता है, उतनी देर लगता है गाँव या मोहल्ला एक ही धुन पर चल रहा है। और सच्ची बात, घूमर का जादू न तेज़ होता है, न शोर वाला—वह धीरे-धीरे सबको अपने घेरे में ले लेता है।

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