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जयपुर बोलेJaipur Bole

जयपुर के अखाड़े और मोहल्ले का स्वैगर

Jaipur ke akhada aur mohalla ka swagger

जयपुर के पुराने मोहल्लों में अखाड़ा सिर्फ कुश्ती की जगह नहीं था, वह रोज़ की शुरुआत था। सुबह अँधेरे में पहलवान मिट्टी पर पाँव रखता, तेल की खुशबू और पसीने की मेहनत से पूरा मोहल्ला जागने लगता। बच्चे दीवार पर चढ़कर देखते, बड़े लोग छोटी-सी हँसी में ताकत नापते। यहीं से सड़क-स्तर का स्वैगर बनता था: सीधी चाल, पक्की बात, और अपने इलाके का मान। हर मोहल्ले का अपना अखाड़ा, अपनी पहचान। कहीं छोटी चौपड़ के पास, कहीं बस्ती के किनारे, कहीं किसी बड़े हवेली के पीछे। एक पहलवान की जीत पूरे गली की जीत लगती थी। घणी सच्ची बात है, जयपुर में मर्दानगी का मतलब सिर्फ़ ज़ोर नहीं, अनुशासन भी था.