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जयपुर के पंडाल, एक शहर और तीन तिथि

Jaipur ke pandal, ek shehar aur teen tithi

जयपुर के दुर्गा पूजा पंडाल इस बार तिथि की अलग-अलग गणना के साथ अपना-अपना दिन पकड़ रहे हैं। कहीं सप्तमी एक दिन पहले मनाई जा रही है, कहीं अष्टमी का हिसाब अलग है, और नवमी भी सब जगह एक साथ नहीं आ रही। यह फर्क पंचिका की परंपरा और तिथि-गणना के भीतर छुपा होता है, इसलिए एक ही शहर में दो पंडाल एक ही दिन को अलग नाम दे देते हैं। इसी चक्कर में विसर्जन की तारीख भी सब जगह एक जैसी नहीं बनती। गलियों में पंडाल के बाहर रंग, ढोल और छोटी भीड़ तो एक-सी है, पर कैलेंडर का पन्ना हर जगह अलग पलट रहा है। एक सेवक की सीधी-सी बात थी: हमारे यहाँ तिथि पहले देखी जाती है, फिर कार्यक्रम बनता है। जयपुर की यही खूबी है — एक ही उत्सव, पर उसका समय हर मोहल्ले में थोड़ा अपना-सा।

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