जयपुर की नीली कारीगरी: रंग का सब्र
जयपुर की नीली कारीगरी में नीला रंग बस रंग नहीं, एक आदत है। कोबाल्ट का घोल, मिट्टी का नर्मपन, और कारीगर का धीमा हाथ—ये तीनों मिलकर वह चीज बनाते हैं जो घर की दीवार, मेज या कुर्सी पर भी शहर का नाम लिख देती है। सांगानेर और आस-पास की गलियों में काम करने वाले लोग पहले आकार बनाते हैं, फिर सुखाते हैं, फिर चमक की परत देते हैं। सच्ची बात, यह जल्दी का काम ही नहीं है। इस कारीगरी का असली जादू उस पल दिखता है जब भट्ठी से निकली चीज ठंडी होती है और उसका नीला रंग एकदम साफ उभर आता है। घणी धीरज चाहिए, और जयपुर के पास वह है ही।
