जयपुर की पावमेंट कुल्फी, और वही पुराना कोना
पीछे से आती गरम हवा, और सामने कुल्फी वाले का छोटा सा ठेला — जयपुर का यह दृश्य नया कभी लगता ही नहीं। शाम होते ही नहर, बाज़ार और गली के मोड़ पर लोग अपनी चाल धीमी कर देते हैं। कोई पिस्ता माँगता है, कोई मलाई, और कोई बस वही पुरानी वाली। बात सिर्फ़ स्वाद की नहीं है। उसी कोने पर बचपन की याद चिपकी होती है, और ठेले वाले की पहचान भी। घणी बार एक ही जगह पर भीड़ इसलिए जमती है क्योंकि लोग नए ठेले से ज़्यादा पुरानी भरोसे वाली ठंडी चीज़ चुनते हैं। जयपुर में कुल्फी का मतलब कभी-कभी बस इतना होता है: थोड़ी देर रुकना, और शहर को गुज़रते देखना.
