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जयपुर बोलेJaipur Bole

जयपुर थाली का पहला, बीच का, आख़िरी रंग

Jaipur thali ka pehla, beech ka, aakhri rang

जयपुर के पुराने ढाबों पर थाली सिर्फ़ खाना नहीं, एक छोटी सी रीति होती है। बाटी सबसे पहले आती है, ताकि घी उसमें उतर जाए; दाल उसके साथ चलती है, और चूरमा अक्सर बगल में, जैसे बाद में बोलने वाली बात। म्हारे यहाँ कई लोग पहले दो बाटी तोड़ते हैं, फिर दाल में डुबोते हैं, और चूरमे को आख़िरी निवाले के लिए बचाते हैं। यह क्रम खाने का नहीं, मज़ा सँभालने का है। घणी बार थाली के बीच रखी घी की कटोरी भी धीरे-धीरे खुलती है, जैसे सबर का हिसाब। सच्ची बात, जयपुर थाली पेट से ज़्यादा याद में टिकती है।