जोहरी बाजार: आँख से खरीद, ऐप से नहीं
जोहरी बाजार में रत्न खरीदने का अंदाज़ अब भी पुराना है। छोटी-छोटी दुकानों के सामने रखे काँच के बक्से, रोशनी में चमकते पत्थर, और दुकानदार की धीमी सी बात—यहीं जयपुर का असली बाज़ार दिखता है। लोग फ़ोन निकालकर ऐप नहीं खोलते, पहले आँख से देखते हैं, फिर थोड़ा घूमकर फैसला करते हैं। यहाँ एक पत्थर का रंग, उसकी सफ़ाई, और कट का कोण सब कुछ मायने रखता है। कारीगर भी सीधे बोल देता है—यह प्राकृतिक है, यह ज़्यादा चमक रहा है। म्हारे जयपुर में बात बस खरीदने की नहीं, पहचान की भी होती है। जोहरी बाजार की यह आदत बताती है कि कभी-कभी सही चीज़ स्क्रीन पर नहीं, शीशे के उस पार मिलती है।
