जौहरी बाजार की पोलकी, घर की यादों का खज़ाना
जौहरी बाजार की पुरानी पोलकी दुकानों के सामने रुकते ही लगता है जैसे छोटा-सा संग्रहालय खुल गया हो। घर जैसी कम रोशनी, काँच के पीछे जड़ाऊ सेट, और दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीरें — सब मिलकर एक ही बात कहते हैं: यह सिर्फ़ बिक्री की जगह नहीं, यादों का खज़ाना है। यहाँ का हर छोटा झरोखा एक कहानी सँभाले बैठा है। किसी सेट के साथ पहली शादी, किसी नथ के साथ नानी की दुआ, किसी हार के साथ पधारो वाली रात। दुकानदार भी सीधे बोलते हैं, “यह माल कल का नहीं, घर का है।” जयपुर की यह अदा घणी अलग है — कारीगरी भी, परिवार भी, और रिश्तों की चमक भी।
