जौहरी बाज़ार में कुंदन-मीना की सांस
जौहरी बाज़ार में सुबह की पहली रोशनी के साथ दुकान के शटर उठते ही सोना चमकने लगता है। एक कोने में कुंदन बैठता है, दूसरे में मीना का रंग। परिवार वाले जौहरी यहीं से चल रहे हैं — दादा का हाथ, पिता की नज़र, और बेटे का सब्र। काम सिर्फ गहना बनाना नहीं, विरासत संभालना भी है। इस बार एक पुराना हार और उसकी डिज़ाइन सबका ध्यान खींच लाई। वह सीधी खरीद-फरोख्त की चीज़ नहीं थी; उसमें तीन पीढ़ियों का काम था, और इसी वजह से उसकी क़ीमत पैसों से ज़्यादा थी। जौहरी की गलियों में ऐसी ही बात चलती है — जो चीज़ दिल से बनती है, वह बाज़ार में देर तक टिकती है। घणी बात, पर सच्ची।
