नेहरू बाज़ार में मोजड़ी और रजाई का जोर
नेहरू बाज़ार में सुबह का रंग अलग ही होता है। दुकान के बाहर मोजड़ी की कतारें लटकी होती हैं और पास ही रजाइयों के मोटे खोल धूल से बचकर चमक रहे होते हैं। चमड़े की मोजड़ी के ऊपर घुँघरू नहीं, पर नक्काशी और रंग ही उसकी शान बनाते हैं। रजाई वाले भाई कहते हैं, "सर्दी आते ही असली पहचान होती है।" यहाँ एक ग्राहक पहले मोजड़ी उलट-पलट कर देखता है, फिर रजाई को उँगली से दबाकर उसकी भराई पर फ़ैसला करता है। कल तक जो जोड़ी 900 की थी, आज 750 तक आ गई — और भाव-तोल के बीच चाय की चुस्की भी चलती रहती है। नेहरू बाज़ार का यही तेवर है: ज़रूरत भी, नरमी भी, और घणी अपनापन भी.
