त्रिपोलिया की लाख चूड़ियाँ, लखेरा हाथ का जादू
त्रिपोलिया बाजार में सुबह की पहली रोशनी के साथ लखेरा कारीगर अपनी छोटी दुकान खोल देते हैं। गरम लाख को छोटी सी आग पर नरम करके, उसमें रंग और काँच के दाने मिलाए जाते हैं। फिर उँगलियों के बीच घूमती गोलाई से कंगन का रूप बनता है। यह काम सिर्फ सामान नहीं, पहचान भी है — लखेरा समाज की पीढ़ी दर पीढ़ी की मेहनत। बापू और जोहरी बाजार की भारी भीड़ में त्रिपोलिया की लाख चूड़ियाँ अपनी अलग चमक रखती हैं। सवाल बस दाम का नहीं, हाथ के काम का होता है। एक पुराने कारीगर ने बताया कि कल रात 200 जोड़े निकल गए, क्योंकि शादी और तीज के लिए ऐसे रंग लोग अब भी ढूँढते हैं। घणी मेहनत, और घणी इज्जत।
