आमेर किले की रैंपार्ट पर सुबह का पहला कदम
सुबह के पहले पहर आमेर किले की रैंपार्ट पर चलना एक अलग ही एहसास है। पत्थर अभी रात की ठंडक संभाले रहते हैं, और पाँव रखते ही हल्की सी थरथराहट महसूस होती है। नीचे माओटा झील पर धुंध तैर रही होती है, जैसे किला एक सफेद सा दुपट्टा ओढ़े हो। फिर धीरे-धीरे एक दो लोग और आते हैं — कोई छोटी सी साँस लेता है, कोई चुपचाप फोटो के बजाय बस नज़ारा देखता है। यहीं असली बात है: पहला कदम अक्सर अकेला होता है, पर उसके बाद का सुकून सबका होता है। घणी सुबह में आमेर का यह हिस्सा जयपुर को याद दिलाता है कि शोर से पहले भी एक खूबसूरत दुनिया होती है।
