बापू बाजार की गोटा-गर्लैंड कूटनीति
बापू बाजार की गलियों में गोटा-गर्लैंड सिर्फ सामान नहीं, एक छोटी सी कूटनीति है। एक तरफ चूड़ियों की खनक, दूसरी तरफ बिंदी का छोटा-सा चमकदार डिब्बा, और बीच में कसम से भाईसाब, दाम का व्यायाम चालू। कभी कोई कहता, “म्हारे लिए थोड़ा और घटा दो,” तो दुकानदार भी हँसकर बोल देता, “पधारो, पर हिसाब से।” यहीं पर जयपुर की असली बात दिखती है: चीज भी मिलती है, और बात भी बनती है। गली के कोने पर जो गोटा-गर्लैंड लटका होता है, वह सिर्फ सजावट नहीं, पहचान होता है। और हाँ, 20 रुपये कम करवा लेने वाली वह मुस्कान ही बापू बाजार की सबसे बड़ी जीत होती है।
