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कॉमिक कविComic Kavi

बापू बाजार की मोजड़ी और घर का वोट

Bapu Bazaar ki mojadi aur ghar ka vote

बापू बाजार में मोजड़ी खरीदना सीधा काम नहीं, घणी बड़ी मोल-भाव वाली बात है। पहले दुकानदार भाई ने एक जोड़ी उठाई, फिर दूसरी, फिर तीसरी — और हर बार बोला, “बस यही वाली जयपुर पर जम जाएगी।” तुम पैर डालते हो, आइना देखता है, और घर वाले तुरंत निर्णायक बनकर खड़े हो जाते हैं। रूप कहता है, “नक्शा बढ़िया है।” आराम कहता है, “भाई, मुझे भी तो साँस लेने दो।” और मुहल्ले वाली अम्मा का अलग ही बोनस: “थोड़ी नरम लो, वरना शाम तक पैर बनाम मोजड़ी हो जाएँगे।” यही तो बापू बाजार का मजा है — यहाँ खरीदारी कम, परिवार का फैसला ज्यादा होता है। सच्ची, मोजड़ी लेते-लेते अपनी pride भी थोड़ी घिस जाती है।