बापू बाज़ार की मोजड़ी, दाम और घमंड
बापू बाज़ार में मोजड़ी खरीदना सिर्फ खरीदारी नहीं, एक पूरा तमाशा है। ग्राहक एक मोजड़ी पैर में डालता है, आईने में नहीं, सीधा अपने फैसले में खुद को देखता है। फिर आती है वही पुरानी बात: “भाई, थोड़ा कम कर दो।” दुकानदार भी हार कहाँ मानता है; उसके चेहरे पर ऐसा दुख आ जाता है जैसे किसी ने उसकी कविता का अंत लिख दिया हो। यहीं जयपुर की असली चमक है — पैसे से ज़्यादा बहाना, और बहाने से ज़्यादा अंदाज़। पाँच रुपये कम हुए या नहीं, पर दोनों तरफ का घमंड पूरा फिट हो जाता है। घणी सच्ची बात: बापू बाज़ार में मोजड़ी का दाम नहीं, तमाशे का टिकट बिकता है।
