नीली कुम्हारी: सूखने के बाद भी ड्रामा
नीली कुम्हारी में पहले हाथ का सब्र, फिर आग की परीक्षा होती है। कारीगर गीली सतह को आकार देते समय साँस भी धीरे लेते हैं, वरना निशान रह जाता है। सूखने के बाद चीज़ सख्त लगती है, पर असली खेल लेप के बाद शुरू होता है: थोड़ा सा झटका, और भईसाब, किनारे पर अचरज की दरार। जयपुर के बाज़ार में इसी मजबूरी को लोग अंदाज़ बोल देते हैं। सांगानेर और उसके आस-पास की दुकानों में यही कहानी मिलती है — चीज़ नाज़ुक, पर नज़र टिक जाए तो दिल छुपा नहीं रहता। सच्ची, कभी-कभी टूटना ही उसकी पहचान बन जाता है।
