डीजे वाले बाबू और नींद का मामला
शादी के मौसम में जयपुर की गलियों में एक नया राग चल पड़ता है—डीजे वाला। पहले लोग मेहमान गिनते थे, अब ध्वनि कितनी दूर जा रही है, वह देखते हैं। ढोल, शहनाई, रीमिक्स, और बास का ऐसा मेल कि खिड़की के काँच भी थोड़ा सोच में पड़ जाएँ। फिर सुबह का दृश्य देखो: जो रात को मंच के पास सबसे आगे था, वही नाश्ते में आँखों को हाथ से सँभाल रहा होता है। घणी मेहनत से नाचा, पर नींद ने पूरा बदला ले लिया। जयपुर का प्यार भी अजीब है—दिल से स्वागत, पर स्पीकर से परीक्षा। और सच्ची बात? डीजे वाले बाबू की धुन खत्म हो या न हो, तकिए का मन तो सीधा “बस कर भाई” वाला ही रहता है।
