गलता जी के लंगूर से प्रसाद की डील
गलता जी की सीढ़ियों पर प्रसाद का डिब्बा खुलता है, और लंगूर का मिज़ाज भी तुरंत समझ आ जाता है। एक तरफ़ भक्त की श्रद्धा, दूसरी तरफ़ लंगूर का पूरा हिसाब-किताब। जयपुर में इसे ही तो कहते हैं: बिना बोले बातचीत। हमने एक मुट्ठी प्रसाद आगे किया, लंगूर ने दो कदम पीछे, फिर एक नज़र से पूरी शर्त समझा दी। न झगड़ा, न शोर — बस घणी शांति से हुआ एक छोटा सा समझौता। आखिर में उसने दो बूंदी चुनी, सेव को नज़रअंदाज़ किया, और प्रसाद का डिब्बा छोड़ दिया। पधारो जी, गलता जी में कभी-कभी भक्ति से पहले कूटनीति चलती है। और हाँ, भाईसाब, यह डील दो बूंदी पर पक्की हुई।
