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कॉमिक कविComic Kavi

गलता जी के लंगूर से प्रसाद की पंचायत

Galta Ji ke langur se prasad ki pazaar

गलता जी में प्रसाद का मामला सीधा नहीं होता, भाईसाब। सीढ़ियाँ चढ़ते ही लंगूर भी अपनी जगह संभाल लेते हैं, और भक्त भी अपना थैला। पहले एक केले का लेन-देन होता है, फिर एक बिस्कुट, तब जाकर प्रसाद का रास्ता खुलता है। म्हारे जयपुर में इसे कूटनीति कम, रोज़ की सौदेबाज़ी ज्यादा समझो। सबसे मजेदार बात यह है कि लंगूर एक ही पल में जज भी लगते हैं और रखवाले भी। जो ढंग से बात करे, उसका काम हो जाए; जो जल्दी हाथ हिलाए, उसका प्रसाद उड़ जाए। गलता की छत की दीवार और पत्थरों के बीच यह छोटी-सी लेन-देन, सच्ची, जयपुर की अपनी हँसी है। पधारो, पर प्रसाद लेकर ही, वरना भीड़ तुरंत बदल जाती है.