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घूमर: घाघरे की एक घूमती कहानी

Ghoomar: ghaghre ki ek ghoomti kahani

घूमर में सबसे पहले नज़र पड़ती है घाघरे की चाल पर: धीमी लेकिन पक्की, जैसे रेत पर निशान। भील समुदाय ने इसे सरस्वती पूजा के साथ जिया, और बाद में राजपूत घरानों ने इसे अपना लिया। घूँघट के पीछे चेहरा छिप जाता है, पर थिरक और घूमना पूरी बात कह देता है। यह नृत्य सिर्फ मंच का नहीं, घर और समाज का भी है। नई दुल्हन के स्वागत में घूमर की रस्म आज भी कई घरों में निभाई जाती है। शादी, तीज, और धार्मिक मौकों पर यह घंटों चल सकता है। सच्ची बात, इसमें राजस्थान की लाज, लय और खुशी सब एक साथ घूमती है।

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