घूमर: राजपूताना घूँघट और घूमती चाल
घूमर में पाँव ज़मीन को छूकर भी हवा का साथ ले लेते हैं। यह राजस्थान का लोक-नृत्य भील समुदाय से शुरू हुआ, जहाँ इसे सरस्वती वंदन के रूप में किया जाता था; बाद में राजपूत घरों में इसने अपना अलग रंग पकड़ा। घूँघट में ढकी औरतें फैले हुए घाघरे में धीरे-धीरे घूमती हैं, और घेरा छोटा-बड़ा होता रहता है। नाम भी ‘घूमना’ से निकला — यानी घूमना, चक्कर लेना। शादी, त्योहार और धार्मिक मौकों पर यह नृत्य घंटों चल सकता है। रीति के मुताबिक, नई दुलहन को अपने नए घर में स्वागत के बाद घूमर करना पड़ता है — इसी लिए यह नृत्य सिर्फ सुंदरता नहीं, घर आने की रस्म भी है।
