गोविंद देव जी के थाल का जयपुर ड्रामा
गोविंद देव जी के मंदिर में भोग-थाल देखकर पहली नज़र में लगता है — बस थोड़ा सा। पर जयपुर की सोच यहीं पलट जाती है। पत्थर के छप्पन भोग का खेल भी ऐसा ही है: एक ही थाल में इतनी सारी चीज़ें, फिर भी सब एक-दूसरे से लड़ती नहीं, बस साथ बैठ जाती हैं। यही तो जयपुर का असली अंदाज़ है, घणी छोटी सी बात में पूरा स्वाद निकाल लेना। कोई घर में दो लड्डू आए तो मेहमान भी खुश, और थाल में छप्पन भोग हो तो भक्ति भी। बस इतना समझ लो — यहाँ “थोड़ा सा” का मतलब कमी नहीं, हुनर होता है। और भाई, गोविंद देव जी का थाल भी जयपुर को वही याद दिलाता है: कम में भी पूरा मन भरता है।
