जयपुर के ऑटो-मीटर की पौराणिक कहानी
जयपुर में ऑटो पकड़ो, तो मीटर को देखकर लगता है जैसे किसी पुराने किस्से की किताब खुल गई। शुरू में वह सीधा दिखता है, फिर यातायात, सिग्नल और एक छोटी सी घूमती गली आते ही उसका रंग बदल जाता है। चालक बोले, “साहब, मीटर चल रहा है,” और यात्री आँख से पूछे, “सच में?” इसी बीच 37 रुपये वाली सवारी का राज बनता है। कभी वैशाली से सिंधी कैंप, कभी एमआई रोड से राजा पार्क — भाड़ा ऐसा निकलता है जैसे संख्या नहीं, कुंडली हो। जयपुर का ऑटो-मीटर इसी लिए मशहूर है: कभी सीधा, कभी टेढ़ा, पर हमेशा चर्चा में। घणी सच्ची बात, इस शहर में मीटर से ज़्यादा भरोसा चालक की सूरत और यातायात के मिज़ाज पर होता है।
