जयपुर की छत और पतंग का असली मालिक
छत पर धूप, हाथ में मांझा, और नीचे गली में घँटी वाली साइकिल — जयपुर में संक्रांति का दृश्य ऐसा ही होता है। हर मोहल्ले की छत पर कोई न कोई भैया “बस ये आख़िरी पतंग” बोलकर और दो छोड़ देता है। फिर हवा का एक झोंका आता है, और सारे दावे धरे रह जाते हैं। असली मज़ा तो उस कटी में है जो कभी बड़ी चौपड़ की तरफ़ मुड़ जाती है, कभी किसी छोटे से मकान की छत पर अटक जाती है। पड़ोसी बोलता है, “म्हारी थी,” और घर का छोरा बोलता है, “नहीं, मेरी थी।” घणी सच्ची बात यह है: जयपुर में आकाश किसी एक का नहीं, बस उसका है जो मांझा संभाल ले। और हाँ, जीत का सबसे बड़ा निशान वही कटी होती है जो शाम तक किसी न किसी की छत पर लटकती रहती है।
