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कॉमिक कविComic Kavi

जयपुर की सुबह और जलेबी का मैदा

Jaipur ki subah aur jalebi ka maida

ओल्ड सिटी की गलियों में सुबह का पहला शोर चाय का नहीं, जलेबी के तेल का होता है। कचौरी के साथ जो जलेबी मिलती है, उस पर जयपुर का हर चाचा विशेषज्ञ बन जाता है: “मैदा हल्का है या भारी?”, “चाशनी भीतर तक गई या सिर्फ ऊपर चिपकी?” बड़ी बात यह कि सबके जवाब अलग, पर थाली एक ही खाली। घंटी वाली गली हो या त्रिपोलिया के पास की दुकान, एक थाली आते ही भाई-भाई वाली बहस शुरू। कोई एक ही बात पकड़ता है—क्रंच सुनाई देना चाहिए। मारवाड़ी में कहें तो, जलेबी ऐसी हो जो “पक्की भी लगे और पल में चली भी जाए।” जयपुर की सुबह का यह मीठा झगड़ा असल में प्यार है, और प्यार का सबसे सीधा सबूत: दूसरी थाली मंगवाना।

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