जल महल की सुबह, झील की खामोशी
सुबह के पहले घंटे में जल महल अलग ही लगता है। झील का पानी बिल्कुल ठहरा हुआ, और महल की पीली दीवार उसमें ऐसी दिखती है जैसे किसी पुरानी याद की सीधी छाया हो। चढ़ाई से लेकर किनारे तक कुछ लोग टहलते मिलते हैं, कोई फोटो खींचता है, कोई बस खड़ा रह जाता है। फिर कबूतरों का झुंड एक साथ उड़ता है और कुछ पल के लिए पूरा नज़ारा हिल सा जाता है। यही तो जयपुर का मज़ा है, भाईसाब — शोर के बीच भी एक लंबी चुप्पी मिल जाती है। जल महल को देखकर लगता है, यह इमारत से ज़्यादा एक ऐसी याद है जो अभी भी साँस ले रही है।
