जालाना सफारी: तेंदुए से ज़्यादा वेटिंग-लिस्ट
जालाना सफारी का असली रोमांच कभी-कभी तेंदुआ नहीं, लाइन होती है। प्रवेश से पहले गाड़ी रुकती है, दूरबीन आगे, और परिवार के सवाल पीछे नहीं छूटते: “कहाँ है वह?”, “थोड़ा और आगे चलाओ”, “एक फोटो और ले लो।” जंगल का मज़ा अपनी जगह, पर जयपुर अंकल की धैर्य-शक्ति का दृश्य अलग ही स्तर का होता है। जालाना में हल्की-सी ख़ामोशी भी बड़ी बात बन जाती है, क्योंकि सबको लगता है बस अब शेर निकलेगा। फिर भी गाड़ी के अंदर टिप्पणी चलती रहती है, जैसे सीधा खेल चल रहा हो। घणी सच्ची बात, सफारी में तेंदुआ आए या न आए, घर वाले जो नाटक करते हैं न, वही असली वन्यजीव अनुभव बन जाता है।
