झरोखे वाली सुबह, छोटी हवेली की
सुबह का जयपुर जब पुराने शहर में उठता है, तो छोटी हवेली पहले साँस लेती लगती है। झरोखे की नक्काशी पर हल्की धूप टिकती है, और आँगन में झाड़ू की नरम आवाज़ घूमती है। गुलाबी बलुआ पत्थर पर सूरज का रंग ऐसा पड़ता है जैसे दीवार ने रात भर में नई परत पहनी हो। नीचे चूल्हा जल चुका है; किसी घर में चाय बन रही है, किसी में बाजरे की रोटी। छोटी हवेली की खिड़की से बाहर गली में एक-दो लोग चुपचाप काम पर निकलते हैं। पधारो वाली इस सुबह में शोर कम है, पर ज़िंदगी पूरी है। घणी शांति में भी जयपुर अपनी पुरानी आदत नहीं भूलता—सँवारना, संभालना, और धूप को भी मेहमान मान लेना।
