जौहरी बाजार: फाइनल प्राइस का नया फाइनल
जौहरी बाजार में चूड़ियाँ खरीदना खरीदारी से ज़्यादा एक खेल लगता है। दुकानदार पहले सीधा कहता है, “बस यह फाइनल है।” ग्राहक थोड़ा मुस्कुराकर दो कदम पीछे हटता है, और कहानी शुरू। पहला फाइनल गिरता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा—घणी बार तो दाम इतना नरम हो जाता है कि चूड़ी से ज़्यादा दिल पिघलने लगता है। यहीं जयपुर की असली कला है: न ग़ुस्सा, न जल्दी, बस मीठी बात और थोड़ा सा खातिरदारी का जादू। जौहरी बाजार में हर “फाइनल” के बाद एक नया फाइनल मिल जाता है, और आखिर में जो दाम बचता है, वह भी आधा मोलभाव और आधा इज़्ज़त होता है। सच्ची, यही तो जयपुर की खरीदारी का रंग है।
