जोहरी बाज़ार का पोलकी, धीमी चमक का किस्सा
जोहरी बाज़ार में पोलकी का मतलब सिर्फ गहना नहीं, एक पुराना जयपुर है। दुकान की शीशे वाली अलमारी में कुंदन के साथ जमी हुई काली चमक, सच्ची लगती है। कारीगर पहले नक्शा बनाता है, फिर पतली परत में पत्थर बिठाता है, और आख़िरी रोशनी को हाथ से साफ करता है। इसलिए पोलकी तेज नहीं चमकती; वह धीरे-धीरे नज़र पकड़ती है। बाज़ार के लोग कहते हैं, सोने से ज़्यादा याद इस बात की होती है कि यह गहना कहाँ से आया, किस हाथ ने बनाया। एक पुराना सेट देखकर एक दुल्हन ने 7 लाख सुनकर बस आँख उठाई और फिर मुस्कुराकर बोला, “म्हारे घर की पहली शान यही होगी।” जोहरी बाज़ार की यही अदा है — शोर में भी सब्र, और सब्र में भी चमक।
