जौहरी बाजार की सोने की धड़कन
जौहरी बाजार की आभूषण गलियों में दिन का पहला रंग शीशे और सोने को मिलाकर बनता है। पतली गलियों में दुकानें एक-दूसरे से सटी दिखती हैं, और हर खिड़की के पीछे कोई न कोई काम चल रहा होता है—कुंदन, मीना, जड़ाऊ या बस पुरानी चीज़ों की साफ-सफाई। छोटी सी कुर्सी, तेज़ नज़र और हल्की सी घंटी की आवाज़; बस यही इस बाज़ार की पहचान है। यहीं एक बूढ़े सेठ ने 17 साल पुरानी चाँदी की माला वापस ली, क्योंकि उनके हिसाब से उसका भार ही उसकी याद था। जौहरी बाजार में चीज़ सिर्फ ज़ेवर नहीं होती, कभी रिश्तों की निशानी भी होती है। घणी देर तक देखोगे तो समझ आएगा—इस बाज़ार की असली चमक हाथ के काम में है, शोर में नहीं।
