जौहरी बाजार की सुबह और जलेबी का पहला घाव
जौहरी बाजार अभी पूरी तरह जागा भी नहीं होता, और जलेबी की कड़ाही पहले से गुनगुना रही होती है। तेल में गोल-गोल घूमती जलेबी, ऊपर से चीनी की चमक — बस देखते ही सुबह का मिज़ाज बदल जाए। पहला कौर ज़ुबान को थोड़ा चकमा देता है; इतना गरम कि म्हारो मुंह एक पल को चुप हो जाए। फिर दूसरा कौर आता है, और वहीं से दोस्ती शुरू। मोहन भाई के ठेले पर यही रोज़ का नियम है: पहले आप संभलते हो, फिर जलेबी आपको संभाल लेती है। जौहरी की ठंड, बाज़ार की खामोशी, और गरम मिठास — घणी सच्ची बात, जयपुर की सुबह का असली सैल्फ़ी बिना कैमरे के यही है।
