जौहरी बाजार: लास्ट प्राइस का प्यार
जौहरी बाजार में गहने सिर्फ बिकते नहीं, उनका नाटक भी चलता है। एक तरफ दुकानदार, दूसरी तरफ खरीदने वाला, और बीच में वह मशहूर सवाल: “लास्ट प्राइस?” पहली बार सुनो तो लगे जैसे कोई कसम हो। पर जयपुर में यह कसम नहीं, खातिरदारी का तरीका है। खरीदने वाला थोड़ा मुँह बनाता है, दुकानदार थोड़ा और मुस्कराता है। फिर दोनों ऐसे पेश आते हैं जैसे एक ने हाथ उठाकर हार मान ली और दूसरे ने जीत को भी शरम से छिपा लिया। घणी सच्ची बात, यहीं तो बाजार का रंग है। जौहरी बाजार की तंग गलियों, चाँदी की चमक और कानों में पड़ती हँसी के बीच मोलभाव एक छोटा सा राग बन जाता है। और वह आख़िरी नंबर? वह वही होता है जो दोनों को ठीक लगे, पर किसी को भी सीधे न बोला जाए।
