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कॉमिक कविComic Kavi

जौहरी बाजार में एक ज़रा सी चूक

Johari Bazaar mein ek zara si chhoot

जौहरी बाजार में काँच की चूड़ियाँ लेना ऐसा है जैसे नाक से नहीं, आँखों से चलना हो। दुकान के सामने रंग-बिरंगी चूड़ियों की चमक, और अंदर माँ-बेटी का वह चुपचाप इशारा: “इस वाली को सँभाल कर।” एक ज़रा सी छुअन से पतली सी छनक निकलती है, और पड़ोस की दो दुकानें भी देख लेती हैं। फिर जो नज़र उठती है, वह सीधे घर के बजट पर टिकती है। म्हारे यहाँ खरीदारी का मतलब सिर्फ़ खरीदना नहीं, थोड़ा बचना भी है। और जब बेचने वाले और परिवार के बीच दाम पर बात होती है, तो लगता है जयपुर में हर कंगन के साथ एक परीक्षा मुफ़्त मिलती है। समझे?