जौहरी बाजार में एक ज़रा सी चूक
जौहरी बाजार में काँच की चूड़ियाँ लेना ऐसा है जैसे नाक से नहीं, आँखों से चलना हो। दुकान के सामने रंग-बिरंगी चूड़ियों की चमक, और अंदर माँ-बेटी का वह चुपचाप इशारा: “इस वाली को सँभाल कर।” एक ज़रा सी छुअन से पतली सी छनक निकलती है, और पड़ोस की दो दुकानें भी देख लेती हैं। फिर जो नज़र उठती है, वह सीधे घर के बजट पर टिकती है। म्हारे यहाँ खरीदारी का मतलब सिर्फ़ खरीदना नहीं, थोड़ा बचना भी है। और जब बेचने वाले और परिवार के बीच दाम पर बात होती है, तो लगता है जयपुर में हर कंगन के साथ एक परीक्षा मुफ़्त मिलती है। समझे?
