जौहरी बाज़ार की बंधनी और मोलभाव
जौहरी बाज़ार में बंधनी का दृश्य अलग ही चलता है। एक तरफ दुपट्टा, दूसरी तरफ दुकानदार का पूरा परिवार-इतिहास: “म्हारी नानी ने भी ऐसा ही पहना था, और यह रंग तो बाड़मेर की धूप जैसा है।” सुनने में सीधी बात, पर हर टुकड़े के साथ एक कहानी जुड़ी होती है। यहीं मोलभाव भी किसी रियासत से कम नहीं। कोई 1500 बोलता है, कोई सीधे 900 पर आ जाता है, और फिर दोनों 1100 पर हाथ मिला लेते हैं — जैसे जीत दोनों की हो। जयपुर की यह मीठी-खट्टी आदत बताती है: यहाँ कपड़ा सिर्फ कपड़ा नहीं, याद और जुबान का सौदा भी है। पधारो, और दुकान से निकलते वक्त लगता है दुपट्टा नहीं, पूरी कहानी ले आए।
