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कॉमिक कविComic Kavi

जौहरी बाजार की चाँदी पॉलिश की जंग

Johri Bazaar ki silver polish ki jung

जौहरी बाजार में सुबह से ही चाँदी की थाल, पायल और कंगन पर पॉलिश का धुआँ-सा उठता रहता है। घर से आया पुराना सामान बोलता है, “मैं तो विरासत की चमक हूँ,” और दुकानदार सीधे काउंटर पर खड़ा होकर कहता है, “भाईसाब, दो घिसाई में पूरी चमक।” यहीं असली हँसी है: माल पुराना, भरोसा नया। कोई कहता है दाग बस हल्के से हैं, कोई कहता है “ये निशान तो परिवार का है।” एक तरफ दादी का नख़्श, दूसरी तरफ दुकानदार की पक्की आवाज़। जौहरी की गलियों में चाय, शोर और घंटी के साथ यह पॉलिश-युद्ध रोज चलता है। और सच्ची बात? कभी-कभी चमक से ज़्यादा मज़ा उस दावे में आता है जो उसे बेच रहा होता है।