कठपुतली कॉलोनी का सरकारी संगीत
कठपुतली कॉलोनी के छोटे मंच पर जब कठपुतली नाचती है, तो लगता है जयपुर की गलियाँ खुद बोल रही हैं। एक हाथ से डोर, दूसरे से आवाज़ बदलती हुई—कभी नेता जैसी भारी, कभी घरवाली जैसी तीखी, कभी प्रेम कहानी जैसी नरम। यहीं से रोज़मर्रा की बात मज़ाक बन कर सबके सामने आ जाती है। कलाकार कहते हैं, लोग हँसने आते हैं, पर घर की, मोहल्ले की और बाज़ार की सारी समझ ले जाते हैं। छोटे कपड़े, नकली मूँछ, और एकदम तीखा संवाद—बस इन्हीं से छोटी सी दुनिया बनती है। खास बात यह कि 3 रुपये देने वाला बच्चा भी पूछ बैठा था: "यह कठपुतली सच बोलती है या हम?" वह सवाल अब भी म्हारे दिमाग में नाच रहा है।
