कठपुतली कॉलोनी: खेल कौन चला रहा है?
कठपुतली कॉलोनी की गलियों में रंग भी है, राग भी, और थोड़ी सी थकान भी। यहाँ कारीगर सुबह से शाम तक लकड़ी, कपड़े और डोर के साथ काम करते हैं, पर असली खेल मंच पर नहीं, उनके जीवन में होता है। एक कठपुतली जितनी सुंदर दिखती है, उतनी ही सीधी उस डोर पर चलती है; म्हारे जयपुर में भी रोज़ का हिसाब कुछ ऐसा ही लगता है। पर मोड़ यह है: हँसते-हँसते यहाँ के लोग अपनी तंगी भी झेल लेते हैं। कोई बोलता है, “डोर ऊपर वाले के हाथ में है,” कोई कहता है, “नीचे वाले की मेहनत से ही शो चलता है।” इसी दोहरी बात का नाम कठपुतली कॉलोनी है। यहाँ का खेल बस तमाशा नहीं, ज़िंदगी का छोटा सा mock stage है।
