कठपुतली: डोर से ज़िंदा होती राजस्थानी कहानी
लकड़ी, कपड़ा और रंग—बस इन तीन चीज़ों से राजस्थानी कठपुतली अपनी दुनिया खड़ी कर लेती है। पधारो मेवाड़ या जयपुर के किसी मेले में, तो एक छोटा सा परदा खुलता है और गुड़िया चलने लगती है। कलाकार डोर को ऐसे सँभालता है कि घोड़ा, राजा या नाचने वाली गुड़िया सब ज़िंदा लगने लगते हैं। इस कला की जान सिर्फ हाथ नहीं, कहानी भी है। हर कठपुतली के साथ एक बोल, एक ताल और एक छोटा सा नाटक चलता है—जिसमें हँसी भी है, बात भी। वह 7-डोर वाला हिसाब इसलिए खास है क्योंकि हर डोर एक अलग अंग चलाती है; इसी से मुख, कंधा और पैर में जान आती है। सच्ची, घणी मेहनत के बिना ये जादू नहीं बनता।
