कठपुतली की गर्दन सीधी, एग़ो भी सीधा
कठपुतली का खेल देखते ही एक बात समझ आती है: मंच पर जो घूमता है, उसका अंदाज़ सबसे तेज़ होता है। नीचे बैठा कलाकार धागे सँभालता रहता है, पर गुड़िया की गर्दन ऐसी उठती है जैसे पूरा फैसला उसी का हो। जयपुर के चौराहों और मेले-स्थलों में यह नज़ारा घणी बार मिलता है। असल मज़ा यही है कि कठपुतली का चेहरा बिना बोले भी बहुत कुछ बोलता है। उसकी तीखी आँख, सीधी कमर और नखरे से भरा झुकना सबको हँसा देता है। और पर्दे के पीछे बैठा कलाकार? वह थोड़ा झुका, थोड़ा पसीना पोंछता, फिर भी खुश। क्योंकि जयपुर में एग़ो का हिसाब कभी-कभी धागे से नहीं, अदा से चलता है।
