कठपुतली ज़्यादा अनुशासित, हम ज़्यादा भटके
त्रिपोलिया और बापू बाज़ार के कोने पर कठपुतली का खेल रुकते ही भीड़ जम जाती है। रंग-बिरंगी पुतलियाँ एक इशारे पर नाचती हैं, और उनके पैर, हाथ, गर्दन—सब बिल्कुल समय पर। वहीं पास खड़े हम लोग? घंटी बजते ही फ़ोन देखने लगते हैं, और लाइन में खड़े होते-होते भी आगे वाले से पूछते रहते हैं, ‘भाई, कितनी देर और?’ इस छोटी सी बात में जयपुर की बड़ी कहानी छुपी है। पुतलियों को धागा संभालता है; इंसान को छोटी-सी मंशा भी मुश्किल से संभलती है। घणी सच्ची बात, बाज़ार में कला तो पुतली कर रही थी, और अनुशासन हमसे माँग रही थी।
