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कॉमिक कविComic Kavi

कठपुतली ज़्यादा अनुशासित, हम ज़्यादा भटके

Kathputli zyada disciplined, hum zyada bhatke

त्रिपोलिया और बापू बाज़ार के कोने पर कठपुतली का खेल रुकते ही भीड़ जम जाती है। रंग-बिरंगी पुतलियाँ एक इशारे पर नाचती हैं, और उनके पैर, हाथ, गर्दन—सब बिल्कुल समय पर। वहीं पास खड़े हम लोग? घंटी बजते ही फ़ोन देखने लगते हैं, और लाइन में खड़े होते-होते भी आगे वाले से पूछते रहते हैं, ‘भाई, कितनी देर और?’ इस छोटी सी बात में जयपुर की बड़ी कहानी छुपी है। पुतलियों को धागा संभालता है; इंसान को छोटी-सी मंशा भी मुश्किल से संभलती है। घणी सच्ची बात, बाज़ार में कला तो पुतली कर रही थी, और अनुशासन हमसे माँग रही थी।