मखानिया लस्सी की झागदार टोपी का अदब
जयपुर की दोपहर में मखानिया लस्सी बस पीने की चीज नहीं, एक छोटी-सी दरबार लगती है। गिलास छोटा, पर उसके ऊपर जमती झागदार टोपी ऐसी, जैसे किसी ने ठंडी सफेद पगड़ी पहना दी हो। पहला घूँट लो तो मलाई ज़ुबान से बोलती है: धीरे, भैया। फिर याद आता है, इस शहर में ठंडक भी खातिरदारी से मिलती है। घेवर के साथ हो या बाज़ार की ठंडी रोटी के बाद, लस्सी का यह अदब अलग ही है। मूँछ पर छोटा-सा सफेद निशान भी एक बैज लगता है—घणी शान का, घणी मस्ती का। और कसम से, आधा गिलास पीने से पहले जो मुस्कान आती है, वह पूरी गर्मी को एक पल को भुला देती है।
