मंगणियार: थार के विरासती सुर
बाड़मेर और जैसलमेर की धूप में मंगणियार गाते हैं, तो लगता है जैसे रेत खुद साँस ले रही हो। यह समुदाय सदियों से विरासती संगीतकार रहा है; गीत उनके घर में काम की तरह नहीं, पहचान की तरह पलते हैं। इनकी धुनों में इंसान, प्रकृति और मुक्ति की बात आती है, पर सबसे खास है थार के अपने राग, जो उत्तर भारतीय शास्त्रीय परंपरा में आम नहीं मिलते। इन्हें राजपूत और चारण जजमानों का सहारा मिला, और उसी रिश्ते ने संगीत को ज़िंदा रखा। म्हारे राजस्थान में ऐसे घर कम नहीं जो मेहमान को रोशनी से पहले सुर सुनाते हों। मंगणियार का गाना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि याद का काम है—रेत, रीति और रिश्तों को एक साथ बाँधने का.
