मनीहारों का रस्सा, मोहल्ले का हौसला
पतंग उड़ानी हो तो जयपुर में सिर्फ पतंग नहीं, पूरा पड़ोस का दृश्य तैयार होता है। मनीहारों के बाजार में डोर, मांझा, गिल्ली-गिल्ली माल और रंग-बिरंगी पतंगों का ऐसा मेला लगता है कि लगता है हवा भी कतार में खड़ी है। कोई बोले, “यह वाली रस्सी ज़्यादा कसी है,” कोई झट से जवाब दे, “अरे, छत पर तो हाथ का जोर भी चाहिए।” छत पर पतंग उड़ाने में एक पतंग के साथ तीन सलाह चलती हैं, दो ताने और एक नसीहत। म्हारे जयपुर में बात सीधी है: पतंग का मजा तभी है जब छत भी साथी हो, और मोहल्ला भी माहिर। गिल्ली-गिल्ली माल के चक्कर में जीत से ज़्यादा मजा उस तैयारी में है जो सब मिलकर करते हैं।
